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श्री दुर्गा नवग्रह मंदिर में द्वादश पार्थिव ज्योर्तिलिंग का पूजन, अभिषेक एवं एक लाख रूद्रि निर्माण चल रहा है। जिसके तहत शुक्रवार को केदारनाथ ज्योर्तिलिंग का पूजन एवं अभिषेक मुख्य यजमान मोनिका राजभूषण चौहान ने किया ।

इटारसी// मनीष जायसवाल

केदारनाथ ज्योर्तिलिंग प्रलय भी जिसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया – पं. विनोद दुबे

भगवान शिव की भक्ति में ही शिव की शक्ति छिपी हुई है। शिव दाता भी है और तांडवकर्ता भी। शिव के बिना सृष्टि कैसी और सृष्टि के बिना शिव कैसे। सावन मास में ज्योर्तिलिंग का पूजन और अभिषेक अपनी अलग मान्यता रखता है। उक्त उदगार श्री द्वादश ज्योर्तिलिंग के मुख्य आचार्य पं. विनोद दुबे ने केदारनाथ ज्योर्तिलिंग के अभिषेक के समय व्यक्त किए। बारह ज्योर्तिलिंगों के पूजन और अभिषेक के अंतर्गत केदारनाथ ज्योर्तिलिंग का पूजन अभिषेक संपन्न हुआ।

पं. विनोद दुबे ने कहा कि कौरव-पांडवो के युद्ध में अपने लोगों की अपनों द्वारा ही हत्या हुई। पापलाक्षन करने के लिए पांडव तीर्थ स्थान काशी पहुंचे। परंतु भगवान विश्वेश्वरजी उस समय हिमालय के कैलाश पर गए हुए हैं, यह सूचना उन्हें वहां मिली। इसे सुन पांडव काशी से निकलकर हरिद्वार होकर हिमालय की गोद में पहंुचे। दूर से ही उन्हें भगवान शंकरजी के दर्शन हुए। परंतु पांडवों को देखकर भगवान शिव शंकर वहां से लुप्त हो गए। यह देखकर धर्मराज बोले, ‘‘है देव, हम पापियों को देखकर शंकर भगवान लुप्त हुए हैं। प्रभु हम आपको ढूँढ निकालेंगे। आपके दर्शनों से हम पाप विमुक्त होंगे। हमें देख जहां आप लुप्त हुए हैं वह स्थान अब ‘गुप्त काशी’ के रूप में पवित्र तीर्थ बनेगा।

पं. विनोद दुबे ने कहा कि पांडव गुप्त काशी (रूद प्रयाग) से आगे निकलकर हिमालय के कैलाश, गौरी कुंड के प्रदेश में घूमते रहे और भगवान शिव शंकर को ढूँढते रहे। इतने में नकुल-सहदेव को एक भैंसा दिखाई दिया उसका अनोखा रूप देखकर धर्मराज ने कहा कि शंकर ने ही यह भैंसे का रूप धारण किया हुआ है, वे हमारी परीक्षा ले रहे है। ’’

पं. विनोद दुबे ने कहा कि गदाधारी भीम उस भैंसे के पीछे लग गए। भैंस उछल पड़ा, भीम के हाथ नहीं लगा। अंततः भीम थक गए। फिर भी भीम ने गदा प्रहार से भैंसे को घायल कर दिया। घायल भैंसा धरती में मुंह दबाकर बैठ गया। भीम ने उसकी पूंछ पकड़कर खींचा। भैंसे का मुंह इस खीचातानी से सीधे नेपाल में जा पहुंचा। भैंसे का पार्श्व भाग केदारनाथ में ही रहा। नेपाल में वह पशुपति नाथ के नाम से जाना जाने लगा।

पं. विनोद दुबे ने कहा कि महेश के उस पार्श्व भाग से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। दिव्य ज्योति में से शंकर भगवान प्रकट हुए। पांडवों को उन्होंने दर्शन दिए। शंकर भगवान के दर्शन से पांडवों का पापहरण हुआ। शंकर भगवान ने पांडवो से कहा, ‘‘मैं अब यहां इसी त्रिकोणाकार मंे ज्योर्तिलिंग के रूप में सदैव रहूूंगा। केदारनाथ के दर्शन से मेरे भक्तगण पावन होंगे। ’’

पं. दुबे ने कहा कि केदारनाथ में पांडवों की कई स्मृतियां जागृत रही है। राजा पांडू इस वन में माद्री के साथ विहार करते समय मर गए थे। वह स्थान पांडुकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। वहां आदिवासी लोग पांडव नृत्य प्रस्तुत करते रहते है। जिस स्थान से पांडव स्वर्ग सिधारे उस ऊँची चोटी को ‘स्वर्ण रोहिणी’ कहते हैं। धर्मराज जब स्वर्ग सिधार रहे थे तब उनका एक अंगूठा शरीर से अलग हो धरती पर गिर गया था। उस स्थान पर धर्मराज ने अंगुष्ठमात्र शिवलिंग की स्थापना की।

केदारनाथ की महिमा बताते हुए पं. विनोद दुबे ने कहा कि उत्तराखंड के हिमाच्छादित क्षेत्र में केदारनाथ विराजित है। वैशाख से लेकर आश्विन माह तक श्रद्धालु केदारनाथ की यात्रा कर सकते है। बाद में पट बंद कर दिए जाते है।

पं. विनोद दुबे ने बताया कि कार्तिक माह में शुद्ध घी का नंदा दीपक जलाकर भगवान को नीचे उरवी मठ लाया जाता है। वैशाख में जब बर्फ पिघल जाती है तब केदारनाथ के पट पुनः खोल दिए जाते है। केदारनाथ का मार्ग अति जटिल है। फिर भी यात्री यहां पहुंचते है।

पं. दुबे ने कहा कि कुछ वर्षो पूर्व केदारनाथ क्षेत्र में आपदा आई लेकिन केदारनाथ शिवलिंग का कुछ भी नहीं बिगड़ा यह शिव का ही चमत्कार है।

 

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