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कृषि विज्ञान केंद्र में रावे की छात्राओं ने केंचुआ खाद बनाने की तकनीक सीखा,खेती में टिकाऊपन एवं लाभकारी बनाने हेतु वर्मीकंपोस्ट एक महत्वपूर्ण आदान.

सिवनी

कृषि विज्ञान केंद्र सिवनी में जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के अंतर्गत संचालित कृषि महाविद्यालय जबलपुर एवं बालाघाट की चतुर्थ वर्ष की 33 छात्रों को ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (रावे) के अंतर्गत 6 माह तक कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से किसानों के खेतों में खेती किसानी के व्यावहारिक गुण एवं तकनीकी जानने हेतु भेजा गया है। कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. शेखर सिंह बघेल के मार्गदर्शन में केंद्र में संचालित केंचुआ खाद उत्पादन इकाई में वर्मी कंपोस्ट तैयार करने हेतु नवीनतम बेड तैयार करना एवं केंचुआ खाद बनाने की संपूर्ण जानकारी को चरणबद्ध तरीके से प्रदान की गई, डॉ बघेल ने बताया कि छात्रों को जैविक खेती के प्रमुख आदान वर्मी कम्पोस्ट तकनीक को बेहतर तरीके से समझने एवं सीखने हेतु प्रत्येक बिंदु पर जानकारी प्रदान करने की दृष्टिकोण से मार्गदर्शन प्रदान किया जा रहा है, कार्बनिक पदार्थ जैसे घरेलू कचरा, शहरी कचरा कृषि अवशेष, पशुओं का गोबर आदि, जिनका विघटन हो सकता है, केंचुआ द्वारा खाकर मल के रूप में विसर्जित पदार्थ को वर्मी कंपोस्ट कहते हैं, यह सभी प्रकार के पेड पौधों, फलवृक्ष, सब्जियां एवं फसलों के लिए पूर्ण रूपेण प्राकृतिक एवं संतुलित खाद होती है केंचुआ खाद उत्पादन हेतु तेजी से वर्मीकंपोस्ट बनाने वाले आइसीनिया फेटिडा प्रजाति के केंचुआ का प्रयोग किया जाता है।रावे कार्यक्रम के प्रभारी एवं मृदा वैज्ञानिक डॉ. के. के. देशमुख द्वारा केंचुआ खाद उत्पादन तकनीक की विस्तार से जानकारी प्रदान की गई डॉ देशमुख ने बताया कि केंचुए मिट्टी के भौतिक रासायनिक और जैविक गुण के संवर्धन में बडी भूमिका निभाते हैं वर्मी कंपोस्ट उत्पादन के लिए स्थान ,छाया की व्यवस्था पानी, कार्बनिक पदार्थ, गोबर एवं केंचुआ की आवश्यकता होती है वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए कच्ची या पक्की सतह पर छायादार स्थान में तैयार किया जा सकता है किसान भाई अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार कच्चे पक्के या कृत्रिम रूप से तैयार वर्मी बेड का उपयोग कर आवश्यकता अनुसार केंचुआ खाद उत्पादन कर सकते हैं केंचुआ खाद उत्पादन के क्षेत्र में सतत कार्य करने वाले जिला एवं राज्य स्तर पर पुरस्कार एव सम्मान प्राप्त प्रगतिशील जैविक कृषक श्री प्रदीप राहंगडाले द्वारा किए जा रहे केंचुआ खाद को उत्पादन एवं स्वरोजगार की दृष्टिकोण से कैसे कार्य किया जा सकता है बाजार में मांग एवं अपने अनुभव एवं केंचुआ खाद के उच्च गुणवत्ता युक्त प्लास्टिक बेड तैयार करने के साथ ही महत्वपूर्ण एवं भविष्य के दृष्टिकोण से उपयोगी सलाह एवं जानकारी रावे छात्रों को प्रदान की। इस दौरान कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. शेखर सिंह बघेल वरिष्ठ वैज्ञानिक, डॉ. के. के. देशमुख वैज्ञानिक, डॉ. एन. के. सिंह, वैज्ञानिक, डॉ. राजेंद्र सिंह ठाकुर, इंजीनियर कुमार सोनी, डॉ. जी. के. राणा आदि की उपस्थिति रही। केंचुआ खाद बनाने एवं खेती में उपयोग करने के अति महत्वपूर्ण लाभ होते हैं केंचुए अपशिष्ट पदार्थों के पुनः चक्रण द्वारा पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने, मृदा में वायु संचार एवं एंजाइमी गतिविधियों को बढाना, पादप रोगजनक नष्ट करना भूमि में जल निकास एवं जल संचार को बढाना, मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढाने, पौधों में प्रतिरोधक क्षमता को बढाना, मृदा के पीएच को संतुलित रखना, सूक्ष्म जीवाणु, हार्मोन एवं ह्यूमिक एसिड एवं फसलों को संतुलित रखने के साथ ही जल, जमीन, हवा को स्वच्छ रखने की दिशा में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

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