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तिलक सिंदूर की पावन धरती पर बिरसा मुंडा जयंती का आयोजन संपन्न हुआ. 

इटारसी//मनीष जायसवाल

आज तिलक सिंदूर की पावन धरती बिरसा मुंडा जयंती का आयोजन संपन्न हुआ.

आदिवासी  जननायक बिरषा मुंडा ने अंतिम समय डा.हेन्डर सन से कहा मेरा पूरा शरीर कपडे मैं लपेट देना पर पैरों को खुले रखना । जिससे समाज को बहुत चलना वाकी है!!

 

*जय जोहार ! जय सेवा !*

*9 जून को बिरषा मुंडा जी शहादत दिवस*

*संक्षेप में जीवन परिचय*

*➡️ बिरसा मुंडा का जन्म में रांची जिले के उलीहातु नामक स्थान में 15 नवम्बर 1875 को हुआ. बिरसा ‘मुंडा’ जी 9 जून 1900 पुण्य तिथि*

*➡️ बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी था। बिरसा के पूर्वज चुटू मुंडा और नागू मुंडा थे। वे पूर्ती गोत्र के थे। वे रांची के उपनगर चुटिया में रहा करते थे। कहा जाता है कि इन दो भाईयों के नामसे इस क्षेत्र का नाम छोटानागपुर पड़ा। चुटिया में अनके वर्षों तक इनका समय बीता। काल – क्रमानुसार इनकी जनसंख्या में वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप इन उपवंश के मुंडा अपने रहने के लिए क्षेत्र की खोज में निकला पड़े। वे खूँटी में मरंगहदा के पास तिलमा पहुंचे और वहां बस गये। वहां से फिर मांझिया मुंडा के नेतृत्व में आगे बढ़े और तमाड़ में मांझीडीह गाँव की स्थापना की। मांझीडीह से वे रंका और लाका मुंडा के नेतृत्व में अडकी प्रखंड के मुख्यालय से 10 किलोमीटर पश्चिम दुर्गम एवं पहाड़ी मार्ग पार पहाड़ की छोटी पर उलीहातु गाँव बसाया ।*

 

*आर्थिक एवं सामाजिक जीवन*

*➡️ ग्राम – उलीहातू में बिरसा वंशजों की आर्थिक स्थिति काफी बिगड़ी हुई थी। परिस्थिति से विविश होकर खेत में काम करने वाले मजदूरों या बंटाईदार अथवा रैयतों के रूप में काम की तलाश में बिरसा का बचपन भी अपने माता – पिता के साथ काफी दिनों तक चलकद में ही व्यतीत हुआ। गरीबी के कारण कुछ बड़े होने पर बिरसा को अपने मामा घर अयुबहातु ले जाया गया। वहीं रहते जयपाल नाग द्वारा संचालित सलगा स्कूल में दाखिला होकर आरंभिक शिक्षा प्राप्त की। वह इस चिंता में भाव –मग्न होकर अध्ययन में इतना तल्लीन रहता था कि उसे भेड़ – बकरियों को चराने के लिए सौंपे गये कार्यों को भी मन लगाकर नहीं निभा पाता था। इस कारण से उसे कभी –कभी अपनी मौसी तथा अन्य लोगों से डांट भी मिल जाया करता था। फलत: उसने वह वहां कुछ समय तक रहा।

 

*धार्मिक

*➡️ बिरसा का जीवन एक अंतर इतना था कि उनके जीवन में काई तरह की विलक्षण घटनाएँ घटी । लोगों की बीमारियों को छूने मात्र से ठीक करने लगा। इस तरह से सास्विक धर्म का सूत्रपात्र हुआ। वह मुंडाओं के बीच प्रचलित बलि प्रथा का विरोध किया और एक नये धर्म का सृजन किया जिसे बिरसाइत धर्म कहा जाता है।*

 

*राजनीतिक आन्दोलन में योगदान*

 

*➡️ बिरसा आन्दोलन धीरे – धीरे स्वतंत्र जन आन्दोलन के रूप में भी विकसित हो रहा था। बिरसा की दमित आंकाक्षा उभर कर सामने आने वाली। धीरे वह एक भूमि संबंधी राजनीतिक आन्दोलन का स्वरुप ले लिया। इस परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव काम कर रहा था। अन्दोलना के प्रभाव से बिरसा के उपदेश का स्वर भी बदल गया। लोग यह दृश्य देखकर डर गये वास्तव में उसका गुस्सा जमींदारों पर था। लोग उन्हें बाबु कहते थे, उसे बाबु ना कहने के लिए आवाज बुलंद किया। आन्दोलन में भूमि संबंधी पृष्ठभूमि कायम थी। इस प्रश्न को लेकर वर्षों तक मुंडाओं के बीच घोर चिंता और असंतोष चल रहा था। शुरू अग्रेजों के प्रति और यहाँ तक कि छोटानागपुर के राजा के प्रति भी निष्ठा प्रकट की थी। वे लोग सिर्फ बिचौलया स्वार्थों को समाप्त करना चाहते थे। बाद में उनमें से कुछ यूरोपियों के प्रति खिलाफ हो गए और सितंबर 1892 में अपनी जनता के समस्याओं के समाधान के लिए हिंसा पर उतारू हो गए। पर उनके सामने कोई स्पष्ट और ठोस राजनीतिक कार्यक्रम न था। ऐसा कार्यक्रम 1895 में बिरसा ने पेश किया पर वह भी कुछ अस्पष्ट – सा था। बिरसा का उद्देश्य अपने को मुंडा राज्य का प्रधान बनना था। साथ ही वह धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता भी हासिल करना चाहता था उनके आन्दोलन के सफल होने की संभावना नहीं थी तो उन्होंने आन्दोलन की तैयारियां शुरू कर दी । और हथियार इकट्ठे किए जा रहे थे। यद्यपि 24 अगस्त 1895 को विद्रोह छिड़ जाने की संभावना न थी, पर शीघ्र ही छिड़ सकता था, यह तय सी बात थी।*

*बिरसा को गिरफ्तार करने के लिए अग्रेजों का षड्यंत्र*

*⏩आन्दोलन छिड़ने की आशंका से बिरसा को। गिरफ्तार करने के लिए सरकार की षड्यंत्र चलने लगी। 22 अगस्त 1895 तक सरकार ने बिरसा को गिरफ्तार करने का निर्णय नहीं लिया था। कमिश्नर चाहते थे कि या तो एक संदिग्ध पागल अथवा शान्ति भंग करने की आशंका उत्पन्न करने वाली कारवाईयों में लगे व्यक्ति के रूप में पकड़ कर लाया जाय। जिला पदाधिकारियों की एक बैठक में बिरसा की गिरफ्तारी की योजना पर विचार हुआ। या योजना के अनुसार भारतीय दण्ड प्रकिया दंडिता धारा 353 और 505 के अधीन गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया। उस वक्त बिरसा चलकद में ही था। पार्टी तीसरे पहर तीन बजे बन्द्गांव से 14 मील की दुर्गम रास्ते तय कर चलकद पहुंची और बिना किसी झंझट के बिरसा को गिरफ्तार कर ले जाया गया। बंदी बिरसा रांची में 4 बजे शाम को लाया गया। उसे कमिश्नर के सामने पेश किया गया और शाम को करीब 7 बजे बिरसा को जेल ले जाया गया। उस पर मुकदमा चला। मुकदमा चलाने का स्थान रांची से बदल कर खूंटी ले जाया गया जो कि मुंडा क्षेत्र का केंद्र स्थान था। इस मुकदमे में बीस गवाहों की जाँच की गयी। अभियुक्त बिरसा ने अपने बचाव में कुछ न कहा और न गवाहों से जिरह की। बिरसा और अन्य अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 505 के अधीन 19 नवम्बर 1895 को दोषी ठहराया गया। उनलोगों को दंगा कराने के अपराध के लिए अतिरिक्त अल्पकालिक सजाएं दी गयी और मुख्य अपराध के लिए दो वर्षों के सश्रम कारावास की सजा दी गई। बिरसा को 50 रूपया जुर्माना भी की गई और जुर्माना न देने की स्थिति में छह महीने सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। अन्य लोगों में से हरेक को 20 – 20 रूपये का जुर्माना किया गया। उन्हें जुर्माना ने देने की स्थिति में तीन महीने की सश्रम कारवास की सजा सुनाई गई। उच्च न्यायालय में अपील करने पर दंडादेश में परिवर्तन किया गया और दो वर्ष छह महीने की सजा घटा कर दो वर्ष कर दी गई। बिरसा के आन्दोलन के दमन और उस बारे में की गई सरकारी करवाई से परिणाम यह हुआ कि घटनाओं ने अत्यधिक सरलता और शीघ्रता के साथ विपरीत दिशा में पलटा खाया। लोगों ने सरकार द्वारा प्रतिशोध के कदम के आशंका से बहुत ही ज्यादा भयभीत होकर पादरी के आड़ में शरण लेना श्रेयकर समझा।*

*➡️ सजा सुनाये जाने के बाद बिरसा को रांची की जेल से हजारीबाग जेल भेज दिया गया उसने वहां दो वर्ष की सजा भोगी सजा खत्म होने के कुछ दिनों पूर्व उसे रांची जेल फिर भेज दिया गया ताकि उसके रिहाई के बाद उसके गतिविधि पर रांची की पुलिस निगाह रख सके। बिरसा को 30 नवंबर 1897 को जेल से रिहा किया गया।*

*⏩साईलरकब पहाड़ी विद्रोही मुंडाओं की एक बड़ी बैठक होनी जा रही थी। यह जगह डोम्बरी से कुछ दूर और सैको से करीब तीन मील उत्तर है बैठक के लिए 25 दिसम्बर 1899 से ही विद्रोही बड़ी संख्या में तीर धनुष और मशाल लेकर सईलरकब पहाड़ी पहुँचने लगे थे। वहां वे घमासान लड़ाई के लिए तैयारी किये हुए थे। यह खबर सुनते ही पुलिस कर्मी उन्हें गिरफ्तार करने के लिए उस पहाड़ी तक पहुँच गई। स्ट्रीटफिल्ड ने विद्रोहियों को चेतवानी दी की यदि उन्होंने तुरंत आत्मसमर्पण न किया तो उनपर गोलियां चलाई जाएगी। पर विद्रोही इसी तरह अड़े रहे और बिना भयभीत हुए विरोध भाव के साथ उन्होंने चिल्ला कर जवाब दिया कि वे लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार थे गोलीबारी शुरू हुई। इसका जवाब विद्रोहियों ने पत्थरों और तीरों से दिया। गोली के बौछार से अनगिनत लोग मारे गये जिसमें महिलाएं एवं बच्चे भी शामिल थे। खून नदियाँ बही, बहुत से बच्चे अनाथ हुए,औरतें विधवा हुई*

*➡️ 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये।*

*➡️ बिरसा ने अपनी अन्तिम साँसें 9 जून 1900 को आंग्रेजों द्वारा जहर देकर मार दिया गया जब डा. हेन्डर सन उन्हें जहर का इंजेक्शन दे रहेंगे थे तो उनके हाथ काप रहें थे बिरषा ने कहा था डॉक्टर का काम है जिंदगी देना लेना नहीं । डॉक्टर हेन्डर सन रोने लगे ओर कहा मैं मजबूर हूँ अग्रैजी हुकूमत का आदेश है तब बिरषा ने कहा था कि डाक्टर मेरी एक ख्वाहिश हैं जो तुम्हें पूरा करना जब मैं मोत के गले लग जाऊं तो मेरे पूरे शरीर को ढंक देना किन्तु मेरे पैरों को खुला रखना जिससे कि समाज को बहुत चलना वाकी हैं*

*➡️ आज भी देश की कुल आबादी का लगभग ग्यारह प्रतिशत आदिवासी है। आजादी के सात दशकों के बीत जाने के बाद भी भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले आदिवासी आज भी उपेक्षित है। आर्थिक जरूरतों की वजह से आदिवासी जनजातियों के एक वर्ग को शहरों का रुख करना पड़ा है। विस्थापन और पलायन ने आदिवासी संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज और संस्कार को बहुत हद तक प्रभावित किया है, इससे पर्यावरण एवं प्रकृति भी खतरे में जा रही है। गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी के चलते आज का विस्थापित आदिवासी समाज, खासतौर पर उसकी नई पीढ़ी, अपनी संस्कृति से लगातार दूर होती जा रही है। आधुनिक शहरी संस्कृति के संपर्क ने आदिवासी युवाओं आज देश की जो स्थिति है, आदिवासी समाज की समस्याएं हैं, उसे बिरसा ने पहले भांप लिया था। यह बताता है कि बिरसा कितने दूरदर्शी थे। इसलिए उन्हें भगवान बिरसा कहा जाता है। आजादी के बाद हमने बिरसा मुंडा की शहादत को तो याद रखा, लेकिन हम उनके मूल्यों, आदर्शों एवं प्रेरणाओं से दूर होते गये। हमारी सत्ताएं उसी व्यवस्था की पोषक होती गयीं, जिनके विरुद्ध उन्होंने लड़ाई लड़ी।*

*➡️ सभी आदिवासी के जहन में उलगुलान की आग दहक रही होगी और जंगल पर अपनी दावेदारी को और ज्यादा पुख्ता करने के लिए वह खुद को वचनबद्ध कर रहा होगा। जंगल पर दावेदारी को लेकर बिरसा मुंडा द्वारा अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आहूत ‘उलगुलान’ आज स्वतंत्र भारत में भी जारी है। क्योंकि हालात आज भी नहीं बदले हैं। आदिवासियों में भयानक गरीबी और असंतोष व्याप्त हैं। उन्हें गांवों-जंगलों से खदेड़ा जा रहा है। जंगलों के संसाधन तब भी असली दावेदारों के नहीं थे और आज भी नहीं हैं आदिवासियों की समस्याएं खत्म नहीं हुईं बल्कि वे ही खत्म होते जा रहे हैं। सब कुछ जस का तस है। यही कारण है कि जल, जंगल और जमीन के हक लिए हर तरफ आदिवासी गोलबंद हो रहे हैं और बिरसा के ‘उलगुलान’ की मशाल को जला रखे हैं।*

 

*➡️उस समय भारत में अंग्रेजी शासन था। आदिवासियों को अपने इलाकों में किसी भी प्रकार का दखल मंजूर नहीं था। यही कारण रहा है कि आदिवासी इलाके हमेशा स्वतंत्र रहे हैं। अंग्रेज़ भी शुरू में वहां जा नहीं पाए थे, लेकिन तमाम षड्यंत्रों के तहत वे घुसपैठ करने में कामयाब हो गये। अंग्रेजों ने ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट 1882’ पारित कर आदिवासियों को जंगल के अधिकार से वंचित कर दिया। अंग्रेजी सरकार आदिवासियों पर अपनी व्यवस्थाएं थोपने लगी। अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वे गांव, जहां वे सामूहिक खेती करते थे, ज़मींदारों और दलालों में बांटकर राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी। और फिर शुरू होता है अंग्रेजों एवं तथाकथित जमींदार व महाजनों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों का शोषणहो रहा है।*

*➡️ अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के साथ-साथ जल-जंगल-ज़मीन की लड़ाई थी। यह मात्र एक विद्रोह नहीं बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था । ब्रिटिश राज, जमींदारों, दिकुओं के खिलाफ बिरसा के विद्रोह ने स्वायत्ता और स्वशासन की मांग की थी*

*➡️ बिरसा मुंडा ने किसानों का शोषण करने वाले जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी लोगों को दी। उनका संघर्ष एक ऐसी व्यवस्था से था, जो किसानी समाज के मूल्यों और नैतिकताओं का विरोधी था। जो किसानी समाज को लूट कर अपने व्यापारिक और औद्योगिक पूंजी का विस्तार करना चाहता था। उनकी इस क्रांतिकारी सोच को देखकर ब्रिटिश सरकार भयभीत हो गयी ।*

 

*➡️ बिरसा मुंडा ने महसूस किया कि आचरण के धरातल पर आदिवासी समाज अंधविश्वासों की आंधियों में तिनके-सा उड़ रहा है तथा आस्था के मामले में भटका हुआ है। यह भी अनुभव किया कि सामाजिक कुरीतियों एवं अंधकारो के कोहरे ने आदिवासी समाज को ज्ञान के प्रकाश से वंचित कर दिया है। वे जानते थे कि आदिवासी समाज में शिक्षा का अभाव है, गरीबी है, अंधविश्वास है। बलि प्रथा पर भरोसा है, हड़िया कमजोरी है, मांस-मछली पसंद करते हैं। समाज बंटा है, जल्दी ही तथाकथित लोगों के #झांसे में आ जाते हैं। इन समस्याओं के समाधान के बिना आदिवासी समाज का भला नहीं हो सकता इसलिए उन्होंने एक बेहतर लोकनायक और समाज सुधारक की भूमिका अदा की।*

*➡️ऐसे ही अनेक आदिवासी संगठन हैं जो जंगल पर दावेदारी के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं। ये सभी मिलकर बिरसा का उलगुलान जारी रखे

पंचायत डोबी तालपुरा सरपंच डोरीलाल चीचाम समिति मिडिया , प्रभारी विनोद वारिवा अभिषेक उईके दिनेश उईके अशोक कासदे विनोद नागले सज्जन वरकडे अजीत वरकडे अन्य लोग उपस्थित थे

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