
सनातन की विशालता,सहिष्णुता और सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण बना “आजाद समाज पार्टी” का आयोजन..
सिवनी मालवा //मनीष जायसवाल
सिवनी मालवा की तिवारी धर्मशाला में आयोजित आजाद समाज पार्टी की बैठक उस समय चर्चा का विषय बन गई जब ब्राह्मण समाज सिवनी मालवा के अध्यक्ष प्रवीण अवस्थी जी वहां पहुंचे और उन्होंने भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा एवं सामाजिक समरसता का एक अद्भुत संदेश समाज को दिया।
ज्ञात हो कि आजाद समाज पार्टी के नेता दामोदर यादव द्वारा पूर्व में सनातन धर्म, भगवान परशुराम एवं हिंदू देवी-देवताओं को लेकर कई आपत्तिजनक एवं अपमानजनक वक्तव्य दिए गए थे, जिससे समाज के अनेक लोगों की भावनाएं आहत हुई थीं। इसके बावजूद ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष प्रवीण अवस्थी जी ने विरोध, कटुता और वैमनस्य का मार्ग न अपनाकर भारतीय संस्कृति की उदारता और सहिष्णुता का परिचय दिया।
बैठक में पहुंचकर प्रवीण अवस्थी जी ने सभी का हार-माला पहनाकर भव्य स्वागत एवं अभिनंदन किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि सनातन धर्म किसी से द्वेष करना नहीं सिखाता, बल्कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः” की भावना के साथ पूरे समाज को साथ लेकर चलने का संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन एवं विशाल विचारधारा है, जहां विरोध करने वालों के लिए भी सद्भाव और सम्मान की भावना रखी जाती है। हमारी संस्कृति संवाद, प्रेम, सहिष्णुता और मानवता को सर्वोपरि मानती है।
प्रवीण अवस्थी जी के इस व्यवहार ने यह सिद्ध कर दिया कि सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की श्रेष्ठ पद्धति है, जो समाज को जोड़ने और मानवता को आगे बढ़ाने का कार्य करती है। जहां एक ओर कुछ लोग समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास करते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे संस्कारित व्यक्तित्व समाज को एकता, प्रेम और भाईचारे का मार्ग दिखाते हैं।
यह घटना सिवनी मालवा ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश बन गई कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए। भारतीय संस्कृति सदैव क्षमा, संयम और सद्भाव का मार्ग दिखाती रही है।
आज आवश्यकता है कि समाज के सभी वर्ग आपसी कटुता छोड़कर राष्ट्रहित, समाजहित और मानवता के लिए एकजुट होकर कार्य करें। यही सनातन का संदेश है और यही भारतीय संस्कृति की पहचान भी है।“सनातन धर्म विरोध नहीं, बल्कि समरसता और मानवता का संदेश देता है।
सिवनी मालवा में ब्राह्मण समाज अध्यक्ष प्रवीण अवस्थी जी द्वारा विरोध के स्थान पर सद्भाव, सम्मान और स्वागत का जो उदाहरण प्रस्तुत किया गया, वह भारतीय संस्कृति की महानता को दर्शाता है।
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः’ की भावना ही सनातन की वास्तविक पहचान है।”









